मंगलवार, 19 नवंबर 2013

प्रतिमूर्ति...

वक्त के थपेड़ों  ने
कितना निर्मम
बना दिया है मुझे
बड़ी बेदर्दी से
मैं अपने
अरमानों का गला
घोंट देती हूँ ,,,

कितनी निर्मोही
हो गई हूँ कि
अपने सपनों के
पंख कतरकर
उन्हें पैरों  तले
रौंदकर
आगे बढ़ जाती हूँ ,,,

किसी परिस्थिति
के हाथों
कमजोर न पड़ जाऊं
इसलिए पलकों क़ी
कोरों पर
आंसुओं को
झलकने भी नहीं देती

फिर भी ............
कहते सुना हैं ,
लोगों  को
कि  स्त्री,
दया,ममता
और स्नेह क़ी
प्रतिमूर्ति है....      ...स्वर्णलता

 अनुभूति में प्रकाशित ...........
                               

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