मैं अकसर
यादों के जंगल में
भटक जाया करती हूँ
उन दरख्तों को ढूँढने
जिनकी छांह में
कभी
आसरा पाया था मैंने
पर
हताश होकर
खोज लेती हूँ
एक तनहा पगडण्डी
क्योंकि
इस गहन कानन में
पतझड़ का मौसम है
और
समझाइशों की
डालियों ने
मुझे पहचानने से
इंकार कर दिया
बातों के फूल
और
एहसास की पत्तियां
रौंदी जा रही थी
पैरों तले
ऐसे में मेरा
लौटना ही
बेहतर है ,,,,,,,,,, स्वर्णलता

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