मंगलवार, 19 नवंबर 2013

उजास की आशा...

 विषादो के अंधियारे
तनहाइयों  की दीवारे
और असंगत से लगनेवाले
प्रश्नों की झाडियां
इन सब के बीच
आशा के जुगनू
हौले-हौले से डोलते
भ्रमित
मेरे आसपास
इस चाहत के साथ
स्पर्श मेरा
करें... न करें...!!!

क्या पता मेरे अंतस के
गहन अंधियारे में
धुंए के सेतुओं से आबद्ध
ह्रदय छूकर
कहीं उनकी
जगमगाहट
न खो जाये
कहीं वह भी
अपना आस्तित्व
न खो दें
इसलिए ,,,
मंडराकर मेरे आसपास
लौट जाते हैं
वे जुगनू
और मैं
ताकती रहती हूँ  उन्हें
आते व जाते हुए
उनकी झिलमिलाहट के साथ
जो तनिक सी रोशनी
का आभास
मुझे होता था
वह भी
छीन जाता है  मुझसे
और मेरी आँखें
निस्तब्ध सी
घुप्प अंधकार में
भटकती रहती हैं
नये उजास की आशा के साथ....!!!
                                                 ---  स्वर्णलता

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