मंगलवार, 19 नवंबर 2013

प्रतिमूर्ति...

वक्त के थपेड़ों  ने
कितना निर्मम
बना दिया है मुझे
बड़ी बेदर्दी से
मैं अपने
अरमानों का गला
घोंट देती हूँ ,,,

कितनी निर्मोही
हो गई हूँ कि
अपने सपनों के
पंख कतरकर
उन्हें पैरों  तले
रौंदकर
आगे बढ़ जाती हूँ ,,,

किसी परिस्थिति
के हाथों
कमजोर न पड़ जाऊं
इसलिए पलकों क़ी
कोरों पर
आंसुओं को
झलकने भी नहीं देती

फिर भी ............
कहते सुना हैं ,
लोगों  को
कि  स्त्री,
दया,ममता
और स्नेह क़ी
प्रतिमूर्ति है....      ...स्वर्णलता

 अनुभूति में प्रकाशित ...........
                               

यादों का जंगल


सोच के दायरे में गुम
मैं अकसर
यादों के जंगल में
भटक जाया करती हूँ
उन दरख्तों को ढूँढने
जिनकी छांह में
कभी
आसरा पाया था मैंने
पर
हताश होकर
खोज लेती हूँ
एक तनहा पगडण्डी
क्योंकि
इस गहन कानन में
पतझड़ का मौसम है
और
समझाइशों की
डालियों ने
मुझे पहचानने से
इंकार कर दिया
बातों के फूल
और
एहसास की पत्तियां
रौंदी जा रही थी
पैरों तले
ऐसे में मेरा
लौटना ही
बेहतर है ,,,,,,,,,,   स्वर्णलता

उजास की आशा...

 विषादो के अंधियारे
तनहाइयों  की दीवारे
और असंगत से लगनेवाले
प्रश्नों की झाडियां
इन सब के बीच
आशा के जुगनू
हौले-हौले से डोलते
भ्रमित
मेरे आसपास
इस चाहत के साथ
स्पर्श मेरा
करें... न करें...!!!

क्या पता मेरे अंतस के
गहन अंधियारे में
धुंए के सेतुओं से आबद्ध
ह्रदय छूकर
कहीं उनकी
जगमगाहट
न खो जाये
कहीं वह भी
अपना आस्तित्व
न खो दें
इसलिए ,,,
मंडराकर मेरे आसपास
लौट जाते हैं
वे जुगनू
और मैं
ताकती रहती हूँ  उन्हें
आते व जाते हुए
उनकी झिलमिलाहट के साथ
जो तनिक सी रोशनी
का आभास
मुझे होता था
वह भी
छीन जाता है  मुझसे
और मेरी आँखें
निस्तब्ध सी
घुप्प अंधकार में
भटकती रहती हैं
नये उजास की आशा के साथ....!!!
                                                 ---  स्वर्णलता