तमाशों और
आडम्बरों से भरी
इस बंजर भूमि पर
रोप दिए है मैंने
घुन खाए
कुछ उम्मीदों के बीज
और
हहराती
पारिजात की
एकनन्हीं डाली
सींचना चाहती हूँ
जिसे मैं
पलकों पर ठहर आई
एक चमचमाती
नन्हीं बूँद से
जो इंतजार में है
सपनों की बदली के...
जो आकर
रख ले जाए
हथेलियों में इसे
और बरसा दे
मेरे आँगन की
बंजर धरा पर
तब शायद
फूट पडे
कोमल कोपलें
कल्पनाओं की
और वीरान होती
बगीची में
गा उठें
कोयल, पपीहा,
भ्रमर, कोई गीत
झुलस चुकी
किरणों की तपिश से
अनछुई खामोशी का-----। ........ स्वर्णलता
(अपनी माटी ... जुलाई-सितम्बर २०१४ अंक में प्रकाशित )
आडम्बरों से भरी
इस बंजर भूमि पर
रोप दिए है मैंने
घुन खाए
कुछ उम्मीदों के बीज
और
हहराती
पारिजात की
एकनन्हीं डाली
सींचना चाहती हूँ
जिसे मैं
पलकों पर ठहर आई
एक चमचमाती
नन्हीं बूँद से
जो इंतजार में है
सपनों की बदली के...
जो आकर
रख ले जाए
हथेलियों में इसे
और बरसा दे
मेरे आँगन की
बंजर धरा पर
तब शायद
फूट पडे
कोमल कोपलें
कल्पनाओं की
और वीरान होती
बगीची में
गा उठें
कोयल, पपीहा,
भ्रमर, कोई गीत
झुलस चुकी
किरणों की तपिश से
अनछुई खामोशी का-----। ........ स्वर्णलता
(अपनी माटी ... जुलाई-सितम्बर २०१४ अंक में प्रकाशित )

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें