गुरुवार, 16 जनवरी 2014

सुकरात


अमृत की  चाह में
कितने घूंट
हलाहल का पान
किन्तु
नीलकंठ नहीं बन पाई...

विष मेरे हलक से
नीचे उतर चुका था
किन्तु नहीं बना
यह कृष्ण  का
चरणामृत...
जिसे पीकर मीरा
भक्ति  के चरम को
छू गई...

इस गरल ने
मुझे क़र दिया
समाप्त
और मृत्युदंड को प्राप्त
मैं बन गई
सुकरात.........!!!
                                   ---स्वर्णलता